मिर्जापुर जनपद के एक घर में ढाई दशक से गौरैया की चहचहाहट जारी है.विश्व गौरैया दिवस 2010 से भले प्रारंभ हुआ हो मगर इस घर में 1991 से गौरैया पक्षी का सरंक्षण किया जा रहा है. गौरैया सरंक्षण करने वाले का मानना है इस पक्षी का सरंक्षण होगा तभी पीपल और बरगद के पेड़ जीवित रहेंगे जो हमारे ऑक्सीजन का सबसे बड़ा स्रोत है. देश में आज भी कई लोग हैं जिनको पक्षियों से प्रेम है.
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के एक ऐसे पक्षी प्रेमी हैं जो विलुप्त हो रहे पक्षी गौरैया का ढाई दशक से संरक्षण कर रहे हैं. हम बात कर रहे है विंध्याचल के रहने वाले मिठूठ मिश्रा की. गौरैया संरक्षण के लिए अपने घर परिसर को गौरैया का आशियाना बनाया है.अपने घर में दर्जनों घोंसले बनाए हुए हैं. दिनभर गौरैया की आवाज गूंजती रहती है गौरैया फ्रेंडली माहौल में आज इनके घर सैकड़ों की संख्या में गौरैया देखे जा सकते हैं. मिठ्ठू मिश्रा बताते हैं उनके घर में 1991 से गौरैया का सरंक्षण किया जा रहा है. इसमें पिता का सबसे बड़ा योगदान रहा .आज घर के परिसर में जगह जगह गौरैयों का घोंसला बनाया गया है.2010 में जब विश्व गौरैया दिवस मनाया गया तो मुझे लगा कि गौरैया का संरक्षण करना बहुत जरूरी है दो बृक्षों के संवाहक है प्रकृति के संरक्षण में अपना बहुत बड़ा योगदान देती. गौरैया ही है जो पीपल बरगद के फलों को खाती है जहां-जहां बीट करती है वहां यह दो पेड़ पीपल बरगद ऑक्सीजन के होते हैं गौरैया नहीं रहेंगे तो ऑक्सीजन के पेड़ बरगद और पीपल नहीं रहेंगे. गौरैया सरक्षित नहीं होंगे तो पीपल और बरगद के वृक्ष विप्लुत हो जाएंगे.
मिठ्ठू मिश्रा ने लोगो से अपील किया कि अपने निवाला से निकाले 2 से 4 दाना अपने घर में बनाये एक छोटा सा आशियाना ताकि आप किताबों में नहीं हकीकत में सुन सके इनका चहचहाना. इस गौरैया को बचाना होगा हम सबको आगे आना होगा. किताबों के सिलेबस में डालकर गौरैया के बारे में बताना होगा.गौरैया पक्षी के माध्यम से पर्यावरण की रक्षा की जाय.
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