मिर्जापुर : अमेरिका में विकसित नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को भारत में पेटेंट मिल गया है,मिर्जापुर के रहने वाले डॉ. मयंक ने तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों के साथ मिलक यह महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है.कई वर्षों की जांच के बाद 24 में से 18 तकनीकी दावों को भारत में स्वीकृति मिली है.आवेदन चेन्नई में दाखिल किया गया और मुंबई स्थित पेटेंट नियंत्रक द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई है. 28 अगस्त 2026 को इस पेटेंट की स्वीकृति भारत सरकार के आधिकारिक पेटेंट जर्नल में प्रकाशित की गई है.
संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन स्थित “नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर” के प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक डॉ. मयंक सिंह एवं डेंड्रिमर प्रौद्योगिकी के जनक के रूप में विख्यात संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. डोनाल्ड टोमालिया और उनकी वैज्ञानिक टीम द्वारा अमेरिका में विकसित नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को कई वर्षों की जांच के बाद भारत में पेटेंट संरक्षण मिला है.बताया जा रहा इस आविष्कार की पेटेंट यात्रा जून 2021 में अमेरिका से शुरू हुई.भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. मयंक सिंह ने इसकी क्षमता को भारत की विशाल और कम लागत वाली औषधि-निर्माण व्यवस्था से जोड़कर देखा और अपनी वैज्ञानिक टीम को भारत में भी इसके पेटेंट संरक्षण के लिए सहमत किया.इसके बाद दिसंबर 2022 में भारत में आवेदन दाखिल किया गया. कई वर्षों की जांच के बाद प्रस्तुत 24 तकनीकी दावों में से 18 को पेटेंट संरक्षण मिला है.आवेदन चेन्नई से दाखिल किया गया और मुंबई स्थित पेटेंट नियंत्रक द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई.अंततः 28 अगस्त 2026 को इस पेटेंट की स्वीकृति भारत सरकार के आधिकारिक पेटेंट जर्नल में प्रकाशित की गई है.
*क्या है नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक और क्यों है महत्वपूर्ण*
डॉ. मयंक और उनकी वैज्ञानिक टीम ने डेंड्रिटिक (अतिशाखित) संरचना पर आधारित इस नई बहुआयामी नैनो-एक्सिपिएंट तकनीक को “सुप्राप्लेक्स” नाम दिया है. कई दवाएं और प्राकृतिक औषधीय पदार्थ पानी में आसानी से नहीं घुलते और शरीर में पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो पाते, जिसके कारण अपेक्षित प्रभाव के लिए अधिक मात्रा की आवश्यकता पड़ती है.इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए यह तकनीक विकसित की गई है, जिसका उद्देश्य सक्रिय पदार्थ की घुलनशीलता और शरीर में उपलब्धता बढ़ाकर कम मात्रा में उसके अधिक प्रभावी उपयोग की संभावना बढ़ाना है.भारतीय पेटेंट में चयनित सक्रिय पदार्थों की पानी में घुलने की क्षमता 10 गुना से 10 लाख गुना तक बढ़ाने से संबंधित तकनीकी दावे को भी संरक्षण मिला है.यह तकनीक आधुनिक दवाएं, प्राकृतिक औषधि, पौष्टिक उत्पाद, खाद्य एवं पेय पदार्थ, पशु चिकित्सा तथा कृषि जैसे कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो रही है और अमेरिका के कई उद्योगों को इसका विशिष्ट प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी किया जा चुका है.
दवा से लेकर खाद्य एवं पौष्टिक पूरकों तक महत्वपूर्ण उपयोग
वैज्ञानिक टीम से हुई बातचीत में डॉ. मयंक ने उदाहरण देते हुए बताया कि क्रिएटिन जैसे खाद्य एवं पौष्टिक पूरकों में भी इस तकनीक की महत्वपूर्ण उपयोगिता है. क्रिएटिन शरीर में ऊर्जा और मांसपेशियों की कार्यक्षमता के लिए महत्वपूर्ण है तथा बढ़ती उम्र में मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए भी इसका अध्ययन किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि क्रिएटिन का सेवन सामान्यतः कई ग्राम में किया जाता है.ऐसे में इस तकनीक का उद्देश्य सक्रिय पदार्थ को शरीर में बेहतर तरीके से उपलब्ध कराकर कम मात्रा में अधिक प्रभावी बनाना है.
*पेटेंट केवल अधिकार नहीं, समाज तक तकनीक पहुँचाने का माध्यम*
डॉ. मयंक का मानना है कि पेटेंट का उद्देश्य केवल आविष्कार के बौद्धिक अधिकारों की रक्षा करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक खोज को प्रयोगशाला से उद्योग और अंततः समाज तक पहुँचाना भी होना चाहिए. उन्होंने बताया कि इस तकनीक का पेटेंट दाखिल करने से पहले उनकी टीम ने इसकी वास्तविक उपयोगिता और व्यावसायिक क्षमता का भी मूल्यांकन किया और इसकी व्यापक संभावनाओं को देखते हुए ही इसे पेटेंट संरक्षण के लिए आगे बढ़ाया गया.डॉ. मयंक ने कहा, “केवल पेटेंट की संख्या बढ़ाना हमारी उपलब्धि नहीं है. पेटेंट की वास्तविक सफलता तब है जब तकनीक उद्योग तक पहुँचे, नए उत्पादों और रोजगार के अवसर पैदा करने में सहायक बने और अंततः समाज के काम आए. इसी सोच के साथ हमने इस तकनीक की उपयोगिता का मूल्यांकन किया और इसे न्यूनतम संभव लागत पर मानव कल्याण तक पहुँचाने की दिशा में आगे बढ़ाया. डॉ. मयंक मूल रूप से मिर्जापुर जिले के चुनार तहसील के बगहीं गांव के रहने वाले हैं.उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से फार्मेसी की शिक्षा तथा सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान, हैदराबाद से फार्मास्युटिकल साइंस एवं प्रौद्योगिकी में पीएचडी की.उन्होंने नलसर विश्वविद्यालय, हैदराबाद से पेटेंट कानून में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी प्राप्त किया है.वर्तमान में डॉ. मयंक अमेरिका स्थित नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर में प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक के रूप में कार्यरत हैं तथा सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में ग्रेजुएट फैकल्टी एवं एडजंक्ट प्रोफेसर हैं. इसके साथ ही वे विश्व स्वास्थ्य संगठन, जिनेवा से सलाहकार के रूप में भी जुड़े हैं. उनके वैज्ञानिक योगदान को अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा मान्यता मिली है तथा वे कई पेटेंट, शोध पत्र और पुस्तक अध्यायों के लेखक भी हैं.इस उपलब्धि पर डॉ. मयंक सिंह और डॉ. डोनाल्ड टोमालिया ने भारत का आभार व्यक्त किया है. डॉ. मयंक ने कहा कि भारतीय पेटेंट मिलना इस तकनीक के लिए एक नई शुरुआत है. अब उनका प्रयास इसे भारतीय उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों से जोड़कर आगे बढ़ाना है, ताकि इसका लाभ रोजगार, उद्योग और समाज तक पहुँच सके.
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